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यूथेनेसिया


इच्छामृत्यु

सच ही कहा गया है जहां चाह है, वहाँ राह है।

जीवन संघर्षों का विषय है। कई राह, मोड ऐसे भी गुजरते हैं जिन स्थितियाँ से लड़ने मैं हम असहज महसूस दिखते हैं, परंतु फिर भी हम उनका पुरजोर मुकाबला कर उन को हरा देते है। 
इच्छा मृत्यु अथार्त यूथेनेसिया मूलतः ग्रीक शब्द है जिसका अर्थ है अच्छी मृत्यु होना, सम्मानजनक मृत्यु होना। यूथेनिसिया यानी इच्छा मृत्यु या मर्सी किलिंग मांग या प्रस्ताव की अनु संज्ञा की गई है। इच्छा मृत्यु अथार्त किसी गंभीर और लाइलाज बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को दर्द से मुक्ति दिलाने के लिए डॉक्टर की सहायता से उस पीड़ित के जीवन का अंत करना होता है| इसमें समाज असाध्य पीड़ा को सहन ना करने पर बात करता है।

लेकिन गौर फरमाने की बात यह भी है कि ऐसे कितने ही मनुष्य है जो लाइलाज बीमारी के साथ ही जन्म लेते है। उनके लिए तो ऐसे किसी प्रावधान की बात नही की जाती। उन्हें तो बस उपदेश दिए जाते है कि यह तो जीवन है, कठनाई तो इसका मूल स्वरूप है। तो गहन से सोचने वाली बात यह भी है कि कहि ये समाज मात्र अपनी सेवा की जिम्मेदारी से बचने के लिए तो इस प्रावधान की मांग नही कर रहा। और दूसरी बात यह की कहि हम इस तरह के मुद्दों पे चर्चा कर आने वाली पीढ़ी के मनोबल को कमजोर तो नही कर रहेमृत्यु को वरण का अधिकार आखिर किसके हाथों में सौंपा जाना चाहिए वे स्वयं, स्वयं वह व्यक्ति संबंधित डॉक्टर.?


यूथेनेसिया के कई प्रकार देखने को मिलते हैं सामान्य तौर पर दो प्रकार प्रमुख हैं—

सक्रिय (एक्टिव) यूथेनिसिया-- इस स्थिति में इच्छा मृत्यु मांगने वाले व्यक्ति को इस कृत्य में सहायता प्रदान की जाती है। उसको इंजेक्शन लगाना, या सुई चुबाकर मुक्ति देना कहा है।

पैसिव यूथेनेसिया-- इस स्थिति में डॉक्टर किसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीज का मेडिकल उपचार बंद कर उसकी लाइफ सपोर्ट मशीनें हटा दे या इसी प्रकार व्यक्ति को मृत्यु दिया जाना शामिल है। इसके कारण व्यक्ति की मृत्यु को प्राकृतिक रूप की मृत्यु कहा जाता है।

 कहाँ कहाँ इच्छा मृत्यु की अनुमति—

अमेरिका जैसे विकसित देश में सक्रिय इच्छा मृत्यु गैर कानूनी है लेकिन वॉशिंगटन एवं तीन राज्यों मे डॉक्टर की इजाजत एवं उसकी मदद से व्यक्ति को मारा जा सकता है जबकि स्विट्जरलैंड में कोई व्यक्ति कानूनी अनुमति के साथ किसी अन्य व्यक्ति या मरीज की आत्महत्या या इच्छामृत्यु में मदद कर सकता है वहां इसे असिस्टेड सुसाइड सुसाइड कहां जाता है। बेल्जियम में 2002 में, इच्छा मृत्यु पर कानूनी मान्यता प्राप्त है साथ ही नीदरलैंड में सक्रिय मृत्यु एवं मरीज की अनुमति से इच्छा मृत्यु की अनुमति दी जा सकती है।

इस परिवर्तन को देखकर अन्य देशों ने भी इस पीड़ा को समझते हुए कानून एवं पीड़ा को सामंजस्य देखकर बदलाव किए हैं हाल ही 2016 में, कनाडा की सरकार ने इजाजत दी एवं फ्रांस एवं ब्रिटेन जैसे यूरोपीय व्यवस्थाएं भी इस ओर झुकती हुई दिखती हैं।


 भारत में बदलाव एवं कानून –

अरुणा शानबाग हो या अनामिका मिश्रा या अन्य मामलों के कारण इस कानून को लेकर बदलाव की मांग उठी।

केरल हाईकोर्ट ने दिसंबर 2001 में असाध्य रोग से पीड़ित बी के पिल्लई को इच्छा मृत्यु की अनुमति नहीं दी गई। वहीं 2005 में काशीपुर उड़ीसा के मोहम्मद यूनुस अंसारी ने भी इस संबंध में राष्ट्रपति से अपील की।

समय के साथ परिवर्तन की मांग उठती आई परंतु कानून के अभाव में इनकी अपील खारिज कर दी गई। इस संबंध में संसद या न्यायपालिका के द्वारा अनुमति प्रदान नहीं की गयी। केंद्र सरकार का कहना है कि विशेष परिस्थितियों में पैसिव यूथेनिसिया सही तो है, लेकिन वह लिविंग बिल का समर्थन नहीं करता हैं क्योंकि यह एक तरह से आत्महत्या है।

फिलहाल कोर्ट के आदेश पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने इससे संबंधित विधेयक लाया जो पैसिव यूथेनेसिया का विषम परिस्थितियों में इजाजत देता है लेकिन इसके तहत कुछ प्रावधान के साथ अंतिम निर्णय मेडिकल बोर्ड सुनिश्चित करेगा।

अरूणा शानबाग मामला

इच्छा मृत्यु को लेकर चर्चित अरूणा शानबाग मामला 2011 में सबसे पहले सुप्रीम कोर्ट पहुँचा। नर्स अरुणा अपने ही हॉस्पिटल में वार्ड बॉय द्वारा रेप की कोशिश का शिकार हुई जिससे वह कौमा में चली गई। जिसके तहत लंबे अंतराल लगभग 42 वर्ष तक कोमा में अचेत एवं जीवन रक्षक प्रणालियों के सहारे नाम मात्र जीवित रहीं।

परंतु कानून के अभाव में उनको मुक्ति दिलाने का साधन नहीं मिला जिसके बाद 2015 में उन्होंने अपने कष्टो से इस संसार से मुक्ति पाई।

इच्छा मृत्यु के पक्ष में विचारधारा—

जैन धर्म संथारा प्रथा को भी इच्छा मृत्यु के समकक्ष देखा जाता है। इस समाज में अंतिम समय में देह त्यागने को पवित्र माना जाता है।

व्यक्ति को अधिकार होना चाहिए की वह निर्णय ले सके कि मृत्यु को कैसे अपनाया जाए, सम्मान से जीने का अधिकार है तो सम्मान से मृत्यु का भी होना चाहिए।

संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा के साथ जीवन का अधिकार, आधार जीवन जीने में गरिमा महत्वपूर्ण है। एक लाइलाज बीमारी है के तहत मुक्ति प्रदान की जा सकती है। जब व्यक्ति का जीवन आनंदित सुखद व्यतीत किया है तो आखरी समय में बीमारी के चलते असहनीय पीड़ा को विराम लगाया जाए अपितु प्रावधान और प्रक्रिया सुनिश्चित की जाए। जब जीवन के सफर में अंतिम पड़ाव मृत्यु का ही होता है तो उसके लिए भी उपयुक्त समाधान होने चाहिए।

 जब अन्य देशों में यूथेनिसिया को लेकर मांग उठी एवं कानून में उपयुक्त बदलाव हुए तो अब समय आ गया है कि हम भी एक मरीज के दुखों का अनुभव कर उसकी पीड़ा से मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करें। व्यक्ति को अपने जीवन से संबंधित अधिकार हैं उनमें मृत्यु भी हिस्सा होना चाहिए। मरीज गंभीर असहनीय पीड़ा से गुजरे तो उसे यह अधिकार मिलना चाहिए है कि वह अपनी इस लाइलाज बीमारी का इलाज कराए या नहीं।

इच्छा मृत्यु के विपक्ष में तर्क—

यह एक जटिल मुद्दा है जिसके तहत भारत अभी तैयार नहीं है। इसकी अनुमति का आशय आत्महत्या जैसे कृत्यों को बढ़ावा देना होगा और हमें पता है कि आईपीसी की धारा 309 के तहत आत्महत्या गैर कानूनी है। हम हमारी सामाजिक व्यवस्था में पूर्णतः प्राकृतिक मौत के पक्षधर रहे हैं।

पौराणिक कथाओं में गौतम बुद्ध ने घायल हंस का घाव साफ कर उसका जीवन बचाया जबकि देवव्रत ने मार गिराने पर, हम सदा ही मारने से अधिक बचाने के पक्षकर रहे हैं| बुद्ध कहते हैं जो जीवन दे नहीं सकता उसे मारने का भी कोई अधिकार नहीं है|

इच्छा मृत्यु मानव जीवन के मूल्य और महत्व के लिए समाज के सम्मान को कमजोर करेगा। विषम परिस्थिति में जीवन के महत्व के स्थान पर उनकी सोच में मृत्यु का विकल्प का रास्ता दिखाएगा। यह डॉक्टर की जवाबदेही को भी कमजोर करेगा, अभी बचाने के हर संभव कोशिश की जाती है परंतु तब विकल्प उनकी इस कोशिश में बाधा बनेगा।

परिवार संबंधी द्वारा भी मरीज पर दबाव पड़ेगा, उनको इच्छा मृत्यु के लिए उकसाया जा सकता है, उनके मन में बीमारी से लड़ने की क्षमता का दोहन होगा।

इसके तहत लिविंग बिल को लेकर भी कई तरह की आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं जिसमें अभी सरकार इसको लेकर समर्थन नहीं करती।

न्यायाधीश ने कहा, एक प्राचीन ग्रीक दार्शनिक की कविता का हवाला दिया..."मैं मृत्यु से क्यों डरूं? जब मैं हूँ तो मृत्यु नहीं। उस चीज़ से मैं क्यों डरूं जिसका अस्तित्व केवल तभी होता है जब मैं नहीं होता?..."


वर्तमान समय में अत्यन्त गम्भीर बीमारियों अथवा असाध्य कष्टों से मुक्ति पाने हेतु इच्छा मृत्यु को वैध ठहराया जाए या नहीं ?

इससे सम्बंधित तमाम नैतिक एवं वैधानिक आयाम पर एक व्यापक नजर डालनी होगी। इसकी वैधता अथवा अवैधता से जुड़े फैसलों में कानून के साथ-साथ नैतिक मूल्यों की अनदेखी न हो, इसका अवश्य ध्यान रखा जाना चाहिए। यदि सांविधानिक पीठ द्वारा इसे मान्यता दे भी दी गई, तो ऐसी व्यवस्था करनी होगी कि इसका दुरुपयोग किसी भी स्थिति में न होने पाएl


Eshitva Singh
Written very well and this is so very good. Keep writing and well done!!